आँखें मलते,  अंगडाई लेते जब रोज सुबह मैं जागता हूँ

टकटकी लगाए,  मेरे तकिये पे बैठे,  इक सपने को मुझे निहारते पाता हूँ  !

वही सपना जिसको मैं सिर्फ हकीक़त में तब्दील करने के लिए नहीं जियूँगा

वही सपना जिसने मुझे सपना दिखाया था की आज से में उसी को जियूँगा !!

 

वही सपना जिसे मैं इस जिंदगी में इक बार तो जी के देखना चाहता हूँ

वही सपना जो खुद मेरा अपना है, जिसको पूरा करने का सपना भी मैं देखता हूँ !

उसी सपने को जीने का वायदा किए रोज मैं उठता हूँ

उसी वायदे को पूरा करने का सपना लिए रोज मैं जीता हूँ !!

 

कभी जब मैं खुद का आवरण आईने में देखने जाता हूँ

अपनी जगह उसी सपने को हँसता मुस्कुराता पाता हूँ !

वही सपना जो सपना हो के भी सपना पालने की जुर्रत करता है

वही सपना जो मेरा ही है और मुझमें ही सिमट जाने का सपना पालता है !!

 

ना जाने कितने सपने उस सपने की धुरी पे घुमते हैं

न जाने कितने सपनों को वो अकेला सपना सींचता है !

मेरा वो सपना है बहुत कोमल,  टूट जाने से बड़ा घबराता है

मेरा वो सपना है बड़ा लालसी,  अधुरा रहने के डर से सकपकाता है !!

 

मुझमे बसा है अगण्य आलस्,  वो मेरे सपने के घर को तोड़ता है

उसी आलस्य को छोड़ने का इक और सपना रोज मैं बुनता हूँ !

टूटते हैं रोज सपने,  फिर भी मैं उसी आलस्य के साथ जीना चुनता हूँ

तोड़ने निकला था आलस के घर को,  कभी-कभी तो सपने बुनना ही छोड़ देता हूँ !!

 

थक हार के जिंदगी के नशे में चूर,  जब मैं वापिस बिस्तर पे लौटता हूँ

टकटकी लगाए, मेरे बिस्तर पे बैठा,  वो सपना मुझसे पूछता है

‘तुम मुझे पूरा करने के लिए रोज इतना जीते हो

जीते भी हो या जीते-जीते, जीते-जी तुम मरते हो !

क्यूँ न आज रात इक वायदा करो कि कल से मुझे पूरा करने के लिए नहीं जियोगे

कल, आज या इसी समय से,  अब से तुम मुझे ही जियोगे’ !!

 

उसे नया सा इक वायदा देके,  मूंदती आँखों में इक नया सपना जगा के

रोज में निनिया रानी की गोद में जाता हूँ !

आँखें मलते, अंगडाई लेते जब रोज सुबह में जागता हूँ

टकटकी लगाए, मेरे तकिये पे बैठे,  इक सपने को मुझे निहारते पाता हूँ  !!

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गौरव गुप्ता ,04/10/2013 (4th October)


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